Sunday, September 6, 2026
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कांग्रेस की नफरत की राजनीति: मृत घोषित कर दिया मुख्यमंत्री धामी को, संवेदनाएं नदारद

 

कांग्रेस की नफरत की राजनीति: मृत घोषित कर दिया मुख्यमंत्री धामी को, संवेदनाएं नदारद

 

लोकतंत्र हमें बोलने का अधिकार देता है।
विरोध करने का साहस देता है।
सवाल उठाने की ताक़त देता है।
लेकिन लोकतंत्र हमें किसी इंसान की संवेदनाओं को कुचलने का अधिकार नहीं देता।
जब किसी जीवित व्यक्ति—चाहे वह प्रदेश का मुख्यमंत्री हो या एक साधारण नागरिक—को प्रतीकात्मक रूप से “मरा हुआ” घोषित किया जाता है, उसकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर तैरती हैं, ढोल-नगाड़ों के साथ उसकी ‘शवयात्रा’ निकाली जाती है, तो यह केवल राजनीतिक असहमति नहीं रह जाती। यह एक गहरी मानवीय क्रूरता बन जाती है।
दुर्भाग्य से, यह तरीका कुछ राजनीतिक दलों की आदत बन चुका है। विपक्ष में बैठी कांग्रेस और उसकी कुछ शाखाएँ ऐसी घिनौनी राजनीति कर रही हैं—व्यक्तियों के खिलाफ अपमान, प्रतीकात्मक मौत का तमाशा और निजी जीवन पर हमला। यह केवल राजनीतिक असहमति नहीं, बल्कि मानवता के खिलाफ शोर है।
यह ठीक वैसा ही है जैसे कोई अपनी नफरत के चलते आपके परिवार के जीवित सदस्य की अर्थी निकाल दे, वो भी आपके ही सामने। हमारे प्रधानमंत्री देश के मुखिया हैं और मुख्यमंत्री राज्य के। ऐसे में इस तरह का घटिया प्रदर्शन केवल और केवल देश और प्रदेश को कमजोर करने और नीचा दिखाने की कोशिश है। यही लोकतंत्र की हत्या है, जो कांग्रेस जैसी राजनीति हर कदम पर करती आई है।
एक पल ठहरकर सोचिए।
उस व्यक्ति के घर में क्या बीतती होगी?
उसके माता-पिता, उसकी पत्नी, उसके बच्चे—जब वे मोबाइल स्क्रीन या अख़बार में अपने जीवित परिजन को मृत घोषित होते देखते होंगे—तो उनके दिल पर क्या गुजरती होगी?
क्या उनका दर्द राजनीति से कमतर है? क्या उनके आँसू किसी विचारधारा के आगे महत्वहीन हैं?
विरोध कीजिए। पूरी ताक़त से कीजिए।
सड़कों पर उतरिए, नारे लगाइए, सरकार की नीतियों को कटघरे में खड़ा कीजिए—यह लोकतंत्र की खूबसूरती है।
लेकिन याद रखिए, विरोध सरकार से होना चाहिए, पद से होना चाहिए, फैसलों से होना चाहिए—किसी इंसान से नहीं।
क्योंकि जब विरोध किसी व्यक्ति की मृत्यु का तमाशा बन जाए, तब वह व्यवस्था के खिलाफ आवाज़ नहीं रह जाता, वह इंसानियत के खिलाफ शोर बन जाता है।
लोकतंत्र असहमति से मजबूत होता है, अपमान से नहीं।
वह तर्क से जीवित रहता है, तिरस्कार से नहीं।
और जिस दिन हम यह फर्क भूल जाते हैं, उस दिन सवाल सत्ता का नहीं, हमारे समाज की संवेदना के मरने का होता है..

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